शायरी - कुछ लव्ज़ अपने, कुछ दर्द आपके



शब भर थी आँखें नम हमारी पर 

    उन्होंने बड़े चैन से अंगड़ाइयाँ ली थी 

    गैरों का हाथ थामकर हमने 

    अपनों की भी बुराइयाँ की थी 


किस पर क्या बीत रही होती है

    यह सोचता कोई नहीं है

    खून के आँसू तो अपने भी रुलाते हैं

    पर पोंछता कोई नहीं है


हयात के कुछ ही दिन तो बाकी हैं

    ज़िन्दगी थोड़े चैन से जी लूँ?

    न जाने फिर कब क़यामत आ जाए

    इसलिए उम्मीद का एक घूँट पी लूँ?


~ सिल्वेस्टर 


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